जंवाई (दामाद) जी चले सौरास (ससुराल) को.

ब्या (शादी) के बाद पहली दफा सौरास (ससुराल) जाना हर दुल्हे का हसीन सपना होता है. दुल्हे राजा जंवाई या दामाद के रूप मैं जब पहली बार ससुराल जाते हैं तो उनके घर मैं उन्हें अनेकानेक सलाह दी जाती हैं. पुराने ज़माने मैं पक्का भोजन एक बड़ी बात होती थी. ससुराल मैं जंवाई जी का स्वागत लगड़ (पूरी) दौड़ लगड़ (कचौरी), बड़ा, सिंगल, पूवा, हलवा , खीर, लड्डू आदि पकवानों से किया जाता था. ऐसे मैं दुल्हे राजा की राल न टपक जाये अतः इजा (माता) व बौज्यू (पिता) की तरफ से ख़ास हिदायतें दी जाती थी. खाना कम खाना है. लालच मत करना नहीं तो ससुराल वाले पेटू समझेंगे आदि आदि. क्योंकि दुल्हा काफी कम उम्र का होता था.हमारी कहानी के नायक जंवाई जी ससुराल पहुंचे. उनका स्वागत नाना प्रकार के लजीज पकवानों से किया गया. जंवाई जी की लार टपक रही थी परन्तु इजा की बात बार बार स्मरण हो आती थी. अतः खाना खाते वक्त बार बार ना नकुर करते रहे.नतीजतन जंवाई जी ने बहुत ही कम खाना खाया और पानी का पूरा लोटा गटक कर भोजन समाप्ति की घोषणा कर बैठै.

रात्रि को जब सोये तो नींद नहीं आई. भूखे पेट सोना वह भी ससुराल मैं. जंवाई जी अपने हाथों अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे थे. अचानक उन्हें छत पर एक मटकी लटकी हुई दिखाई दी. उन्होंने मटकी के अन्दर हाथ डाला तो उसमें शहद सा पदार्थ मिला. जंवाई जी खुश.बस फिर क्या था. उन्होंने शहद चाटना शुरू कर दिया. नीद भी जोर की लगी थी. अतः उन्होंने मटकी के नीचे एक छोटा सा छेद कर डाला. उस छेद से बूंद बूंद शहद निकलने लगा. जंवाई जी लेटे लेटे शहद की बूदों का आनंद लेने लगे. इस बीच उन्हें भूख से कुछ राहत मिली तो उन्हें निद्रा देवी ने आ घेरा. वह टुप्प सो गए .रात भर शहद की बूंदे उनके चेहरे पर पड़ती रहीं तथा बदन की तरफ भी बहती रहीं, परन्तु जंवाई जी तो घोड़े बेच सो चुके थे. प्रातः जब नीद खुली तो उन्हें अपने चेहरे व बदन पर चिपचिपा लगा. उन्हें रात की बात याद आ गई. खताड़ी (लिहाफ) के एक कोने से उन्होंने रुई निकाली और अपने चेहरे व बदन को साफ़ करने लगे. परन्तु यह क्या रुई से शहद साफ करते समय उनके चेहरे व बदन पर रुई चिपक गई तथा उनका चेहरा विभीत्स दिखने लगा. परन्तु कमरे मैं आरषी (शीशा) न होने के कारण उन्हें यह बात पता नहीं चली.

सुबह सास जी जब जंवाई जी को चाय देने के लिए आई तो उन्हें एक सफ़ेद रुई के चेहरे वाला भयानक स्नोमैन दिखाई दिया. वह चिल्लाई और बेहोस हो गईं. जंवाई जी भी डर के मारे कुंवे की तरफ नहाने को दौड़े, परन्तु उनके साले, साली व ससुर ने उन्हें घेर लिया. उनकी पिटाई की नौबत आने को ही थी कि जंवाई जी चिल्लाये – मैं तुम्हारा जंवाई हूँ. वस्तुस्थिति मालूम होने पर उन्हें स्नान करवाया गया. परन्तु ससुराल मैं जंवाई राजा की जो फजीहत हुई वह कभी न भूल पाए. गाँव वाले तो इस किस्से को सुन कर चटखारे लेते हुए कई दिन तक हंसी के मारे लोट पोट होते रहे.

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