अक्कड़ बक्कड़ बोम्बे बौ, अस्सी नब्बे पूरे सौ...............

बचपन के दिन भी निराले होते हैं. हम लोग बचपन मैं राम चरित्र मानस के राम सलाका प्रश्नोतरी की तरह प्रश्न किया करते थे. इस प्रश्न वाले खेल को लड़कियां ज्यादा खेला करती थी. खेलने वाले बच्चे अपने हाथ को उलटा जमीन मैं रखते थे. एक बच्चा निम्न तुकबंदी की कविता बोला करता था.

अक्कड़ बक्कड़ बोम्बे बौ, अस्सी नब्बे पूरे सौ.
सौ मैं लगा तागा, चोर निकल कर भागा.

वह प्रत्येक हाथ को छू कर आगे बढता था. जिसके हाथ मैं अंतिम शब्द ‘भा गा’ आता था, वही चोर माना जाता था. यानि वह हार जाता था. फिर हारे हुवे बच्चे को चोर मानते हुवे चोर को ढ़ूढ़ने के लिए लुक्का छुप्पी का खेल शुरू होता था.
कुछ लोग इसे खड़े हो कर भी खेलते थे.

कुछ लोग निम्न प्रकार की तुकबंदी कविता कहते थे.

मिलता मिलता साथी, जो न मिले चोर

कभी कभी अन्ताक्षरी प्रारंभ करने के लिए भी इस तुकबंदी का प्रयोग किया जाता था.

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