एक गाँव मैं एक दंपत्ति रहते थे. आदमी हाड़ तोड़ मेहनत कर खूब कमाई करता था. उसकी पत्नी बहानेबाज थी तथा हमेशा बीमार रहती थी. उसने उसका इलाज डॉक्टर, वैद्य, हकीम सबसे ही कराया. उसने जागर भी लगाई. परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ. उसकी बिमारी का पता ही नहीं चला. उसका एक दोस्त था. उसने सलाह दी कि वह बाहर जाने का बहाना बना कर देखे कि उसकी पत्नी उसके अनुपस्थिति मैं क्या करती है. उसने अपनी बीबी से कहा कि वह बाहर जा रहा है और उसके लिए दवा भी लाएगा. वह छत मैं जा कर छुप गया और छत मैं धुन्वरा (चिमनी जहाँ से धुंवा ऊपर को जाता है) मैं से नीचे को देखने लगा. धुंवे के कारण उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया. परन्तु उसने छोइया बनाने की खुसबू सूंघी. उसने सुना की छोइया एक बार तवे पर डाला और एक बार पलटा. इस प्रकार कुल सोलह बार अल्टा पलटी हुई. उसने हिसाब लगा लिया कि कुल आठ छोइया बने हैं. वह घर मैं वापस आगया. उसने देखा कि उसकी पत्नी तो भली चंगी बैठी है और बैठकर छोइया (आटा गुड़ का मिश्रण कर उसे गूँथ कर पतला घोल बना कर रोटी की तरह बनाया जाता है) खा रही है. पत्नी ने चार छोइया छुपा लिए थे और पति को केवल चार ही छोइया दिखाए . पति ने कहा कि उसे सिद्धि प्राप्त हो गई है. वह जागर लगाएगा. उसने बताया कि उसके आंग (शरीर) मैं देवता आता है उसने जागर लगाई और नाचना शुरू किया. नाचते नाचते उसने कहा कि तू बिलकुल बीमार नहीं है. तू नखरे लगाती है तथा कहा.
आ पट्ट सोल च्यां, चार यों छी चार कां
बीबी कि चोरी पकड़ी गई. यह भी पता चल गया कि उसकी पत्नी को कोई बिमारी नहीं है. औरत भी शर्मिन्दा हुई और उसने बहाने बनाना छोड़ दिया.
